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हिंदी साहित्य का प्राचीन (आदिकाल: 1050-1375 वि.सं.) और मध्यकालीन (भक्ति/रीतिकाल: 1375-1900 वि.सं.) इतिहास अपभ्रंश, वीरगाथा, और भक्तिपूर्ण काव्यों से समृद्ध है। आदिकाल में वीरगाथा (रासो काव्य) व सिद्ध-नाथ साहित्य था, जबकि मध्यकाल में निर्गुण-सगुण भक्ति (तुलसी, सूर, मीरा) और रीतिकालीन शृंगारिक काव्य ने हिंदी को समृद्ध किया।
प्राचीन और मध्यकालीन हिंदी साहित्येतिहास के मुख्य बिंदु:
प्राचीन काल / आदिकाल (लगभग 1050-1375 वि.सं.):
प्रवृत्ति: वीरगाथा (युद्ध वर्णन) और सिद्ध-नाथ साहित्य।
मुख्य रचनाएँ: 'पृथ्वीराज रासो' (चंदबरदाई), 'बीसलदेव रासो' (नरपति नाल्ह)।
भाषा: अपभ्रंश, डिंगल-पिंगल, और प्रारंभिक हिंदी।
मध्यकालीन हिंदी साहित्य (भक्ति काल: 1375-1700 वि.सं.):
निर्गुण धारा: कबीर (ज्ञानमार्गी), मलिक मुहम्मद जायसी (प्रेमाश्रयी-सूफी)।
सगुण धारा: तुलसीदास (रामभक्ति), सूरदास (कृष्णभक्ति), मीराबाई।
विशेषता: लोकभाषा का प्रयोग और धार्मिक सद्भाव।
उत्तर मध्यकाल / रीतिकाल (1700-1900 वि.सं.):
प्रवृत्ति: शृंगार रस, लक्षण ग्रंथ, और दरबारी संस्कृति।
प्रमुख कवि: बिहारी, केशवदास, भूषण, घनानंद।
भाषा: ब्रजभाषा की प्रधानता।
यह युग हिंदी भाषा के विकास और पद्य साहित्य के चरम उत्कर्ष का काल रहा है।
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