TARGT HP LT TET | Commission 2025
10,000 अतिमहत्वपूर्ण प्रश्न
पार्ट-11
हिंदी साहित्य : फास्ट रिवीजन क्लास
M.A HINDI ENTRANCE | HP LT TET | LT COMMISSION |TGT PGT HINDI | NET SET JRF HINDI | A.P HINDI
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🔴 26. नायिका भेद वर्णन की दृष्टि से सर्वप्रथम ग्रन्थ कौनसा है?
🔸 नायिका भेद वर्णन की दृष्टि से भरतमुनि का 'नाट्यशास्त्र' ही सर्वप्रथम ग्रन्थ है, जिसमें पहले-पहल नायिका-भेद का चित्रण किया गया है, हालांकि यह मुख्यतः नाटकीय पात्रों के वर्गीकरण पर केंद्रित था। इसके बाद अग्निपुराण में प्रथम बार नायक-नायिका का विवेचन श्रृंगार रस के आलंबन विभावों के रूप में किया गया है।
🔴 27. रीतियुगीन कवियों का सर्वाधिक प्रिय छंद कौनसा रहा है?
🔸 रीतिकालीन कवियों का सर्वाधिक प्रिय छंद कवित्त और सवैया रहा है। ये दोनों छंद श्रृंगार और वीर दोनों रसों के लिए समान रूप से उपयुक्त माने जाते थे और रीतिकाल के अधिकांश कवियों द्वारा व्यापक रूप से प्रयोग किए जाते थे।
🔴 28. छंद निरूपक ग्रंथों में कौनसी कृति प्राचीनतम है?
🔸 छंद निरूपक ग्रंथों में सबसे प्राचीन कृति आचार्य पिंगल द्वारा रचित छन्दःशास्त्र है, जिसे छन्दसूत्र भी कहा जाता है. यह सूत्रशैली में लिखा गया सबसे पहला उपलब्ध ग्रंथ है और इसे छंदशास्त्र का आदि ग्रंथ माना जाता है.
🔴 29. बिहारी सतसई पर 'फिरंगी सतसई' नामक फारसी मे टीका ग्रन्थ किसने लिखा है?
🔸 बिहारी सतसई पर 'फिरंगी सतसई' नामक फारसी टीका मुंशी देवी प्रसाद 'प्रीतम' ने लिखी है, जो इस रचना के उर्दू में किए गए अनुवाद 'गुलदस्त बिहारी' के रचनाकार भी हैं।
🔴 30. रीतिकालीन मनोवृत्ति का सर्वश्रेष्ट प्रतिनिधित्व किसके काव्य मे मिलता है?
🔸 रीतिकालीन मनोवृत्ति का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधित्व बिहारी के काव्य में मिलता है, क्योंकि उनकी कविता में रीतिकालीन प्रवृत्तियों जैसे अलंकारप्रियता, कलात्मकता और विषय-वस्तु के कुशल संयोजन की अनोखी छटा दिखाई देती है.
🔴 31. रीतिकालीन के राष्ट्रकवि कौन है?
🔸 रीतिकालीन कवि नहीं, बल्कि राष्ट्रकवि का पद आधुनिक युग के कवि मैथिलीशरण गुप्त और रामधारी सिंह दिनकर को मिला था, इसलिए 'रीतिकालीन के राष्ट्रकवि' जैसा कोई कवि नहीं था. रीतिकालीन कवि मुख्य रूप से श्रृंगार और दरबारी भावों से संबंधित रचनाएँ करते थे, जबकि राष्ट्रकवि का कार्य राष्ट्रीय भावना को बढ़ावा देना था.
🔴 32. भूषण के काव्यो के कौनसे रस प्रधान है?
🔸 भूषण के काव्य का प्रधान रस वीर रस है, जो उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जैसे शिवराज भूषण, शिवाबावनी और छत्रसाल दशक। रीति काल में जब अधिकतर कवि श्रृंगार रस की रचना कर रहे थे, तब भूषण ने वीर रस पर प्रमुखता से रचना करके अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई।
वीर रस की प्रधानता के कारण:
स्वतंत्र पथ का निर्माण: रीतिकाल की श्रृंगार प्रधान प्रवृत्ति से हटकर भूषण ने वीर रस को प्रमुखता देकर अपना एक स्वतंत्र मार्ग निर्मित किया।
ओजपूर्ण वर्णन: उनकी कविताओं में शिवाजी और छत्रसाल जैसे राजाओं के शौर्य और पराक्रम का ओजस्वी वर्णन मिलता है, जो वीर रस को दर्शाता है।
राष्ट्रीय चेतना का चित्रण: भूषण के काव्य में राष्ट्रीय चेतना और जातीय स्वतंत्रता का स्वर मिलता है, जिसके कारण उन्होंने वीर रस का प्रयोग किया।
प्रसिद्ध कृतियाँ:
शिवराज भूषण: यह अलंकार ग्रन्थ है जिसमें छत्रपति शिवाजी की वीरता का वर्णन है।
शिवाबावनी: इसमें छत्रपति शिवाजी के 52 मुक्तकों में उनकी वीरता का बखान है।
छत्रसाल दशक: इसमें महाराज छत्रसाल की वीरता का यशोगान किया गया है।
🔴 33. रीतिकालीन लक्षण ग्रन्थो की काव्य परम्परा के अंतिम चरण के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि कौन है?
✅ रीतिकालीन लक्षण-ग्रंथों की परंपरा के अंतिम चरण के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि बेनी प्रवीन हैं, जिन्होंने 'नवरसतरंग' नामक ग्रन्थ लिखा था।
🔴 34. श्रृंगार रस का सार ग्रन्थ किसे कहा गया है?
✅ श्रृंगार रस का सारग्रंथ या "रसराज" उसे कहा जाता है जो श्रृंगार रस को प्रमुखता और गहराई से दर्शाता है, जैसे कि राजा भोज का ग्रंथ शृंगार प्रकाश है, जिसमें श्रृंगार रस पर विस्तार से विवेचन है और इसे श्रृंगार रस को समर्पित एक विशाल संग्रह माना जाता है। यह ग्रंथ ११वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज द्वारा लिखा गया माना जाता है।
🔴 35. पद्माकर की अन्तिम प्रसिद्ध रचना कौनसी है?
✅ पद्माकर की अंतिम प्रसिद्ध रचना गंगालहरी है, जो उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय में कानपुर में गंगा के तट पर लिखी थी। इस रचना में कवि की भक्ति और वैराग्य भावना अभिव्यक्त होती है, और यह उनके निधन से कुछ समय पहले पूर्ण हुई थी।
🔴 36. पद्माकर ने अपनी रचनाओं को किन तीन रस के आधार पर लिखा है?
✅ पद्माकर ने अपनी रचनाएँ मुख्य रूप से शृंगार रस, वीर रस, और भक्ति रस के आधार पर लिखी हैं। वे इन तीनों भावों को अपनी कविताओं में सहजता से व्यक्त करते हैं, जिसमें शृंगार और प्रेम के साथ शौर्य और भक्ति का भी चित्रण मिलता है।
🔴 37. रीतिकालीन प्रबंध काव्यों को प्रसिद्धि किस कारण नही मिली है?
✅ रीतिकाल में प्रबंध काव्य को प्रसिद्धि न मिलने का मुख्य कारण है कि उस युग के कवियों का ध्यान शृंगारिकता, चमत्कार प्रदर्शन, और आश्रयदाता राजाओं के वैभव का वर्णन करने में अधिक था, जबकि प्रबंध काव्य के लिए आवश्यक गहन कथा-वस्तु और दीर्घकालीन महाकाव्यिक संरचना पर कम ध्यान दिया गया।
🔴 38. रीतिकाल के पतन का कारण क्या था?
✅ रीतिकाल के पतन का प्रमुख कारण तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति में आया गिरावट थी, जिसमें मुगल साम्राज्य का कमजोर होना, दरबारों का विलासिता में डूबा रहना और कवियों का दरबारी जीवन से प्रभावित होकर श्रृंगारिक रचनाओं तक सीमित रह जाना शामिल है।
पतन के मुख्य कारण:
राजनीतिक अस्थिरता: औरंगजेब की नीतियों से मुगल साम्राज्य कमजोर हुआ, जिसके बाद नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली के हमलों से देश में युद्ध और अराजकता फैली।
विलासिता और पतन: आंतरिक शासकों ने स्वतंत्र होकर विलास का आश्रय लिया, जिससे व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई।
दरबारों का प्रभाव: विलासप्रिय राजाओं के संरक्षण में रहने वाले कवियों ने उनकी रुचि के अनुसार श्रृंगारिक और दरबार आधारित रचनाएँ कीं, जिससे देशभक्ति और वीरता की भावनाएँ कम हो गईं।
सामाजिक और धार्मिक गिरावट: धर्म के मूलभूत सिद्धांतों से दूर होकर बाह्याचरण को महत्व दिया जाने लगा, और वैष्णव संप्रदाय के लोभी पीठधीश भी राजाओं को दीक्षा देकर ऐश्वर्य-विलास में लिप्त हो गए।
आर्थिक अव्यवस्था: देश में युद्ध और गृह कलह के कारण आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई, और राजाओं के पास कवियों को संरक्षण देने के लिए पर्याप्त साधन नहीं रहे।
🔴 39. केशवदास का जन्म कब हुआ?
✅ आचार्य केशवदास का जन्म 1555 ईस्वी में ओरछा में हुआ था।
🔴 40. केशवदास के ग्रन्थ कौन कौनसे है?
✅ केशवदास के नौ प्रामाणिक ग्रंथ हैं: रसिकप्रिया, कविप्रिया, नखशिख, छंदमाला, रामचंद्रिका, वीरसिंहदेव चरित, रतनबावनी, विज्ञानगीता, और जहाँगीर जसचंद्रिका. रसिकप्रिया उनकी प्रौढ़ रचना है जिसमें रस, वृत्ति और काव्यदोषों का विशद वर्णन है, जबकि कविप्रिया इन्द्रजीत सिंह की प्रेमिका गणिका प्रवीण राय को शिक्षा देने के लिए लिखी गयी थी.
🔴 41. मतिराम ग्रंथावली की आलोचनात्मक भमिका किसने लिखी है?
✅ प्रस्तुत ग्रंथ 'मतिराम-ग्रंथावली' पं० कृष्णविहारीजी मिश्र की वह महती कृति है, जिसके प्रकाशन के पश्चात् मिश्रजी की गणना हिंदी के अग्रणी समालोचकों में की जाने लगी थी।
🔴 42. शुक्ल जी ने रीतिकाल का अन्तिम श्रृंगारी कवि किसे माना है?
✅ आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रीतिकाल के किसी भी एक कवि को "अंतिम श्रृंगारी कवि" नहीं माना है। उन्होंने घनानंद को रीतिमुक्त धारा का अग्रणी कवि माना और चिंतामणि को रीतिकाल का प्रवर्तक कहा था। रीतिकाल की विशेषता श्रृंगार रस की प्रचुरता थी, जिसके कारण इसे श्रृंगार काल भी कहा जा सकता है।
विस्तार से:
घनानंद: आचार्य शुक्ल ने घनानंद को रीतिमुक्त काव्यधारा का अग्रणी कवि माना है, जो श्रृंगार रस में प्रवाहपूर्णता और हृदय की पीर को दर्शाते हैं।
चिंतामणि: शुक्ल जी ने चिंतामणि को रीतिकाल का प्रवर्तक माना है, जो रीतिकाल के कवियों की परंपरा स्थापित करने वाले थे।
रीतिकाल का "अंतिम" कवि: शुक्ल जी ने रीतिकाल के अंत का निश्चित निर्धारण अलग से नहीं किया है, न ही किसी एक कवि को "अंतिम श्रृंगारी कवि" बताया है। उन्होंने रीतिकाल को श्रृंगार रस की प्रमुखता के कारण श्रृंगार काल भी कहा है।
अतः, शुक्ल जी के अनुसार रीतिकाल में एक ही कवि अंतिम श्रृंगारी नहीं था, बल्कि घनानंद को उस विशिष्ट परंपरा का प्रमुख कवि कहा जा सकता है।
🔴 43. रामचन्द्रिका महाकाव्य की रचना किस आधार पर एक ही रात मे हो गई थी?
✅ रामचंद्रिका महाकाव्य की रचना एक रात में होने का आधार एक किंवदंती है, जो कवि केशवदास के अत्यधिक पांडित्य और अलौकिक क्षमता को दर्शाता है, न कि यह वास्तविक ऐतिहासिक तथ्य है. इस किंवदंती के अनुसार, केशव को किसी ऐसे पात्र से शर्त लगी थी कि वे रामकथा को एक ही रात में पूरा कर सकते हैं, जिसे उन्होंने अपनी असाधारण विद्वत्ता और कविता कौशल से पूरा किया.
🔴 44. वृत तरंगिणी ग्रन्थ के कवि कौन है?
✅ वृत तरंगिणी नामक कोई प्रसिद्ध ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है, परन्तु 'राजतरंगिणी' के लेखक कल्हण हैं और 'राग तरंगिणी' के लेखक पंडित लोचन हैं.
🔴45. रसिक गोविन्द किस सम्प्रदाय के रीतिकालीन कवि थे?
✅ रसिक गोविन्द निम्बार्क सम्प्रदाय के रीतिकाल के कवि थे, जो हरिव्यास की गद्दी के शिष्य थे और सर्वेश्वरशरण देव जी से दीक्षा ली थी। इनका कविता काल विक्रम की उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से अंत तक माना जाता है और इनके प्रमुख ग्रन्थ 'रसिक गोविन्द', 'अष्टदेशभाषा', 'कलियुगरासो' और 'युगलरस माधुरी' हैं।
🔴 46. आधुनिक काल मे घनानन्द ग्रन्थावली का संपादन किसने किया?
✅ आधुनिक काल में घनानंद ग्रंथावली का संपादन विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने किया था। उन्होंने घनानंद की रचनाओं का संकलन कर उन्हें संपादित किया।
🔴 47. हिंदी साहित्य की उतर मध्यकाल रीतिकाल नामक पुस्तक किसकी है?
✅ "हिंदी साहित्य का उत्तर मध्यकाल: रीतिकाल" नामक कोई प्रसिद्ध पुस्तक नहीं है; बल्कि, यह एक सामान्य अवधि है जिसे विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग नामों से संबोधित किया है, जैसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा 'रीतिकाल' और विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा 'शृंगार काल'।
विवरण
रीतिकाल: यह नाम आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा दिया गया है और हिंदी साहित्य के उत्तर मध्यकाल (लगभग 1700-1900 ईस्वी) की उस धारा को संदर्भित करता है जिसमें कविताओं में रस, अलंकार, गुण आदि का विवेचन और रीति ग्रंथों की रचना प्रधान थी।
शृंगार काल: विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इस काल को 'शृंगार काल' नाम दिया, क्योंकि इस युग की अधिकांश रचनाओं में शृंगार रस की प्रधानता थी।
अलंकृत काल: मिश्रबंधुओं ने इस काल को 'अलंकृत काल' कहा है, क्योंकि इस काल में अलंकरण की प्रधानता थी।
संक्षेप में, "हिंदी साहित्य की उत्तर मध्यकाल रीतिकाल नामक पुस्तक" किसी व्यक्ति की रचना नहीं है, बल्कि यह उत्तर मध्यकाल की एक साहित्यिक प्रवृत्ति का नाम है जिसे विभिन्न साहित्यकारों ने अलग-अलग नामों से पुकारा है।
🔴 48. हरिचरणदास ने बिहारी सतसई की टीका किस नाम से लिखी है?
✅ हरिचरणदास ने बिहारी सतसई की टीका "सत्सई-टीका" या "बिहारी-सतसई टीका" नाम से लिखी थी.
🔴 49. किस कवि ने वीर रसात्मक प्रबंध काव्य लिखा है?
✅ कवि भूषण ने वीर रसात्मक प्रबंध काव्य लिखे हैं, और उन्हें वीर रस का प्रमुख कवि माना जाता है. उनकी कविताओं में ओज और जोश भरपूर होता है, और उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज के समय में उनकी वीरता का वर्णन किया है.
🔴 50. रीतिकाल को रीतिकाव्य किसने कहा है?
✅ रीतिकाल को "रीति काव्य" के नाम से डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन ने पुकारा है. हालांकि, आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस काल को रीतिकाल नाम दिया और इस शब्द का व्यापक अर्थ ग्रहण किया. वहीं, मिश्रबंधुओं ने इसे अलंकृत काल कहा, और आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे श्रृंगार काल नाम दिया है.
नामकरण का संदर्भ:
डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन: उन्होंने रीतिकाल के स्वरूप को देखते हुए इसे "रीति काव्य" कहा, जो काव्य की पद्धतियों और नियमों के विवेचन पर आधारित था.
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: उन्होंने इस काल को "रीतिकाल" नाम दिया, जिसमें उन्होंने 'रीति' शब्द के व्यापक अर्थ को शामिल किया, जैसे रस, अलंकार, गुण आदि का विवेचन.
मिश्रबंधु: उन्होंने अलंकृतियों की प्रधानता के कारण इस काल को "अलंकृत काल" नाम दिया.
आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र: उन्होंने श्रृंगार रस की प्रधानता को देखते हुए इसे "श्रृंगार काल" कहा.
संक्षेप में, रीतिकाल के लिए विभिन्न नाम दिए गए हैं, जिनमें से "रीति काव्य" नाम डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन का है.
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