🔴 26. नायिका भेद वर्णन की दृष्टि से सर्वप्रथम ग्रन्थ कौनसा है?
✅ नायिका भेद वर्णन की दृष्टि से भरतमुनि का 'नाट्यशास्त्र' ही सर्वप्रथम ग्रन्थ है, जिसमें पहले-पहल नायिका-भेद का चित्रण किया गया है, हालांकि यह मुख्यतः नाटकीय पात्रों के वर्गीकरण पर केंद्रित था। इसके बाद अग्निपुराण में प्रथम बार नायक-नायिका का विवेचन श्रृंगार रस के आलंबन विभावों के रूप में किया गया है।
नाट्यशास्त्र में नायिका भेद
भरतमुनि का 'नाट्यशास्त्र' ही नायिका भेद की परंपरा का प्रारंभिक ग्रंथ है।
इसमें पात्रों के वर्गीकरण को प्रस्तुत किया गया है, जिसमें नायक और नायिका के भेद भी शामिल हैं।
यहां नायिका-भेद के भेदों और उपभेदों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
आगे के ग्रंथ
अग्निपुराण: इस ग्रंथ में श्रृंगार रस के आलंबन विभावों के रूप में नायक और नायिका का प्रथम बार विवेचन किया गया है।
दशरूपक: धनंजय का 'दशरूपक' इस परंपरा का दूसरा प्रमुख ग्रंथ है, जिसमें नायिका भेद का विस्तार से वर्णन किया गया है।
रीतिकाल के ग्रंथ: हिन्दी साहित्य में, रीतिकाल में विभिन्न कवियों ने नायिका भेद पर विशद लेखन किया, जैसे केशवदास की 'रसिकप्रिया', नंददास की 'रसमंजरी' आदि।
🔴 27. रीतियुगीन कवियों का सर्वाधिक प्रिय छंद कौनसा रहा है?
✅ रीतिकालीन कवियों का सर्वाधिक प्रिय छंद कवित्त और सवैया रहा है। ये दोनों छंद श्रृंगार और वीर दोनों रसों के लिए समान रूप से उपयुक्त माने जाते थे और रीतिकाल के अधिकांश कवियों द्वारा व्यापक रूप से प्रयोग किए जाते थे।
कवित्त और सवैया छंद के बारे में:
कवित्त (या घनाक्षरी): यह एक मात्रा-प्रधान छंद है जिसमें १६ और १२ मात्राओं पर यति होती है।
सवैया: यह एक वर्ण-वृत्त है जो सवैया छंद से बना होता है।
रीतिकाल में इन छंदों का प्रयोग अलंकरण और रस चित्रण के लिए किया जाता था। कवित्त को विशेष रूप से श्रृंगार और वीर रस के प्रकटीकरण के लिए उपयुक्त माना गया।
🔴 28. छंद निरूपक ग्रंथों में कौनसी कृति प्राचीनतम है?
✅ छंद निरूपक ग्रंथों में सबसे प्राचीन कृति आचार्य पिंगल द्वारा रचित छन्दःशास्त्र है, जिसे छन्दसूत्र भी कहा जाता है. यह सूत्रशैली में लिखा गया सबसे पहला उपलब्ध ग्रंथ है और इसे छंदशास्त्र का आदि ग्रंथ माना जाता है.
छन्दःशास्त्र (पिंगलशास्त्र)
रचयिता: आचार्य पिंगल
स्वरूप: यह सूत्रशैली में लिखा गया है.
महत्व: इसे छंदशास्त्र का पहला और सबसे प्राचीन उपलब्ध ग्रंथ माना जाता है.
उद्गम: छंद का उद्गम वेदों से माना जाता है, और यह पिंगल के छंदसूत्र के रूप में उपलब्ध है.
🔴 29. बिहारी सतसई पर 'फिरंगी सतसई' नामक फारसी मे टीका ग्रन्थ किसने लिखा है?
✅ बिहारी सतसई पर 'फिरंगी सतसई' नामक फारसी टीका मुंशी देवी प्रसाद 'प्रीतम' ने लिखी है, जो इस रचना के उर्दू में किए गए अनुवाद 'गुलदस्त बिहारी' के रचनाकार भी हैं।
🔴 30. रीतिकालीन मनोवृत्ति का सर्वश्रेष्ट प्रतिनिधित्व किसके काव्य मे मिलता है?
✅ रीतिकालीन मनोवृत्ति का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधित्व बिहारी के काव्य में मिलता है, क्योंकि उनकी कविता में रीतिकालीन प्रवृत्तियों जैसे अलंकारप्रियता, कलात्मकता और विषय-वस्तु के कुशल संयोजन की अनोखी छटा दिखाई देती है.
बिहारी के काव्य में रीतिकालीन मनोवृत्ति का प्रतिनिधित्व:
अलंकारिता और कलात्मकता: बिहारी को अलंकार प्रयोग का सिद्धहस्त कवि माना जाता है. उनकी कविता में कलात्मक प्रस्तुति और अलंकारिक चमत्कार अपने उत्कृष्ट रूप में दिखाई देता है, जिसके कारण उन्हें रीतिकाल का सर्वश्रेष्ठ कलाकार स्वीकार किया जाता है.
दोहों में असीम अर्थ: बिहारी ने अपने अद्भुत भाषा-सामर्थ्य से दोहे जैसे छोटे छंद में असीम अर्थ-संभावनाएँ भर दी हैं.
अद्वितीय कलात्मकता: उनकी रीतिसिद्ध कविता, काव्यकला की कसौटी पर खरी उतरती है और अभिव्यक्ति की कलात्मकता का सर्वोच्च रूप प्रस्तुत करती है.
सर्वोपरि कवि के रूप में प्रतिष्ठा: अलंकार के कौशलपूर्ण प्रयोग और कलात्मक अभिव्यक्ति के कारण बिहारी को रीतिकाल का सर्वोपरि कवि माना जाता है, जिसकी प्रशंसा ग्रियर्सन जैसे आलोचकों ने भी की है.
संक्षेप में, बिहारी की बिहारी सतसई में रीतिकालीन काव्य की सभी मुख्य प्रवृत्तियाँ अपने चरम और विशिष्ट रूप में दिखाई देती हैं.
🔴 31. रीतिकालीन के राष्ट्रकवि कौन है?
✅ रीतिकालीन कवि नहीं, बल्कि राष्ट्रकवि का पद आधुनिक युग के कवि मैथिलीशरण गुप्त और रामधारी सिंह दिनकर को मिला था, इसलिए 'रीतिकालीन के राष्ट्रकवि' जैसा कोई कवि नहीं था. रीतिकालीन कवि मुख्य रूप से श्रृंगार और दरबारी भावों से संबंधित रचनाएँ करते थे, जबकि राष्ट्रकवि का कार्य राष्ट्रीय भावना को बढ़ावा देना था.
रीतिकालीन कवि और राष्ट्रकवि में अंतर
रीतिकालीन कवि: ये कवि हास-विलास और दरबारी जीवन से जुड़े थे. रीतिकाल में श्रृंगार रस की प्रधानता थी, और कवियों ने अपनी रचनाएँ राजदरबारों के लिए कीं. उदाहरण के लिए, चिंतामणि, भिखारीदास, और बिहारीलाल इस परंपरा के कवि थे.
राष्ट्रकवि: राष्ट्रकवि उपाधि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत रचनाएँ करने वाले कवियों को दी जाती थी.
मैथिलीशरण गुप्त: को पहली बार राष्ट्रकवि की उपाधि मिली थी, जब उन्होंने 'भारत-भारती' जैसे राष्ट्रप्रेम से प्रेरित होकर रचनाएँ कीं.
रामधारी सिंह दिनकर: भी राष्ट्रकवि थे, जिन्होंने अपनी कविताओं में स्वतंत्रता आंदोलन की भावना और ओज को प्रस्तुत किया.
निष्कर्ष
इसलिए, यदि आप 'रीतिकालीन के राष्ट्रकवि' के बारे में पूछ रहे हैं, तो इसका उत्तर यह है कि रीतिकालीन कवि राष्ट्रकवि नहीं होते थे. यह उपाधि आधुनिक कवियों को दी गई थी जो राष्ट्रीय चेतना और देशप्रेम को बढ़ावा देते थे.
🔴 32. भूषण के काव्यो के कौनसे रस प्रधान है?
✅ भूषण के काव्य का प्रधान रस वीर रस है, जो उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जैसे शिवराज भूषण, शिवाबावनी और छत्रसाल दशक। रीति काल में जब अधिकतर कवि श्रृंगार रस की रचना कर रहे थे, तब भूषण ने वीर रस पर प्रमुखता से रचना करके अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई।
वीर रस की प्रधानता के कारण:
स्वतंत्र पथ का निर्माण: रीतिकाल की श्रृंगार प्रधान प्रवृत्ति से हटकर भूषण ने वीर रस को प्रमुखता देकर अपना एक स्वतंत्र मार्ग निर्मित किया।
ओजपूर्ण वर्णन: उनकी कविताओं में शिवाजी और छत्रसाल जैसे राजाओं के शौर्य और पराक्रम का ओजस्वी वर्णन मिलता है, जो वीर रस को दर्शाता है।
राष्ट्रीय चेतना का चित्रण: भूषण के काव्य में राष्ट्रीय चेतना और जातीय स्वतंत्रता का स्वर मिलता है, जिसके कारण उन्होंने वीर रस का प्रयोग किया।
प्रसिद्ध कृतियाँ:
शिवराज भूषण: यह अलंकार ग्रन्थ है जिसमें छत्रपति शिवाजी की वीरता का वर्णन है।
शिवाबावनी: इसमें छत्रपति शिवाजी के 52 मुक्तकों में उनकी वीरता का बखान है।
छत्रसाल दशक: इसमें महाराज छत्रसाल की वीरता का यशोगान किया गया है।
🔴 33. रीतिकालीन लक्षण ग्रन्थो की काव्य परम्परा के अंतिम चरण के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि कौन है?
✅ रीतिकालीन लक्षण-ग्रंथों की परंपरा के अंतिम चरण के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि बेनी प्रवीन हैं, जिन्होंने 'नवरसतरंग' नामक ग्रन्थ लिखा था।
🔴 34. श्रृंगार रस का सार ग्रन्थ किसे कहा गया है?
✅ श्रृंगार रस का सारग्रंथ या "रसराज" उसे कहा जाता है जो श्रृंगार रस को प्रमुखता और गहराई से दर्शाता है, जैसे कि राजा भोज का ग्रंथ शृंगार प्रकाश है, जिसमें श्रृंगार रस पर विस्तार से विवेचन है और इसे श्रृंगार रस को समर्पित एक विशाल संग्रह माना जाता है। यह ग्रंथ ११वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज द्वारा लिखा गया माना जाता है।
मुख्य बिंदु:
शृंगार रस का सारग्रंथ: शृंगार प्रकाश (Shringara-Prakasha) नामक ग्रंथ को श्रृंगार रस का सारग्रंथ कहा गया है।
रचयिता: इसका रचनाकाल 11वीं शताब्दी के आरंभ का माना जाता है, और इसे परमार वंश के राजा भोज द्वारा लिखा गया है।
महत्व: यह संस्कृत काव्य का एक विशाल संग्रह है, जिसमें श्रृंगार रस को प्रमुखता दी गई है, और इसके अनुसार श्रृंगार रस "एकमात्र स्वीकार्य रस" है।
अन्य नाम: श्रृंगार रस को 'रसराज' या 'रसपति' भी कहा जाता है।
🔴 35. पद्माकर की अन्तिम प्रसिद्ध रचना कौनसी है?
✅ पद्माकर की अंतिम प्रसिद्ध रचना गंगालहरी है, जो उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय में कानपुर में गंगा के तट पर लिखी थी। इस रचना में कवि की भक्ति और वैराग्य भावना अभिव्यक्त होती है, और यह उनके निधन से कुछ समय पहले पूर्ण हुई थी।
अतिरिक्त जानकारी:
पद्माकर ने कानपुर में अपने जीवन के अंतिम सात साल गंगा के तट पर बिताए थे।
"गंगालहरी" के अतिरिक्त, उनकी कुछ अन्य प्रसिद्ध रचनाओं में जगद्विनोद, पद्माभरण, और हिम्मतबहादुर विरुदावली शामिल हैं।
पद्माकर रीतिकालीन कवियों में सर्वाधिक उल्लेखनीय माने जाते हैं, और उन्हें एक कवि और आचार्य दोनों के रूप में जाना जाता है।
🔴 36. पद्माकर ने अपनी रचनाओं को किन तीन रस के आधार पर लिखा है?
✅ पद्माकर ने अपनी रचनाएँ मुख्य रूप से शृंगार रस, वीर रस, और भक्ति रस के आधार पर लिखी हैं। वे इन तीनों भावों को अपनी कविताओं में सहजता से व्यक्त करते हैं, जिसमें शृंगार और प्रेम के साथ शौर्य और भक्ति का भी चित्रण मिलता है।
यहाँ इन रसों का वर्णन है:
शृंगार रस: पद्माकर ने शृंगार और प्रेम का विस्तृत वर्णन किया है, जिसमें उन्होंने प्रेम की विभिन्न अनुभूतियों को सजीवता से चित्रित किया है।
वीर रस: अपनी रचनाओं में वे शौर्य, युद्धों, और राजपूतों के पराक्रम का भी वर्णन करते हैं।
भक्ति रस: सांसारिक जटिलताओं और नश्वरता के वर्णन के साथ-साथ, उनकी कविताओं में भक्ति के भाव भी दिखाई देते हैं।
संक्षेप में, पद्माकर का भाव-क्षेत्र विस्तृत है और वे इन तीनों रसों को अपनी काव्य-कला में सजीवता और प्रवाहपूर्णता के साथ प्रस्तुत करते हैं।
🔴 37. रीतिकालीन प्रबंध काव्यों को प्रसिद्धि किस कारण नही मिली है?
✅ रीतिकाल में प्रबंध काव्य को प्रसिद्धि न मिलने का मुख्य कारण है कि उस युग के कवियों का ध्यान शृंगारिकता, चमत्कार प्रदर्शन, और आश्रयदाता राजाओं के वैभव का वर्णन करने में अधिक था, जबकि प्रबंध काव्य के लिए आवश्यक गहन कथा-वस्तु और दीर्घकालीन महाकाव्यिक संरचना पर कम ध्यान दिया गया।
यहाँ कुछ प्रमुख कारण दिए गए हैं:
शृंगारिकता की प्रधानता: रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्ति शृंगारिकता थी और कवियों ने इसी पर अपना ध्यान केंद्रित किया, जिससे कथावस्तु आधारित प्रबंध काव्यों का महत्व कम हो गया।
चमत्कार प्रदर्शन और काव्य-सौंदर्य: रीतिकालीन कवियों का झुकाव पांडित्य-प्रदर्शन, अलंकारों का प्रयोग और शब्दावली के चमत्कार पर अधिक था, जो प्रबंध काव्य के लिए अनुकूल नहीं है।
आश्रयदाताओं का प्रभाव: कवियों का मुख्य उद्देश्य अपने आश्रयदाता राजाओं के शौर्य, दानशीलता और वैभव का गुणगान करना था। इस कारण वे किसी एक महान और लंबी कथा के निर्माण में व्यस्त न होकर दरबारी कवियों जैसा काम करते रहे।
कथा-वस्तु का अभाव: प्रबंध काव्य के लिए एक सुगठित और विस्तृत कथा-वस्तु की आवश्यकता होती है, लेकिन रीतिकाल में ऐसे विस्तृत कथानकों पर काम करने के बजाय कवियों ने मुक्तक छंद और रीतिबद्ध रचनाओं को प्राथमिकता दी, जो तत्काल प्रशंसा दिलाती थीं।
🔴 38. रीतिकाल के पतन का कारण क्या था?
✅ रीतिकाल के पतन का प्रमुख कारण तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति में आया गिरावट थी, जिसमें मुगल साम्राज्य का कमजोर होना, दरबारों का विलासिता में डूबा रहना और कवियों का दरबारी जीवन से प्रभावित होकर श्रृंगारिक रचनाओं तक सीमित रह जाना शामिल है।
पतन के मुख्य कारण:
राजनीतिक अस्थिरता: औरंगजेब की नीतियों से मुगल साम्राज्य कमजोर हुआ, जिसके बाद नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली के हमलों से देश में युद्ध और अराजकता फैली।
विलासिता और पतन: आंतरिक शासकों ने स्वतंत्र होकर विलास का आश्रय लिया, जिससे व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई।
दरबारों का प्रभाव: विलासप्रिय राजाओं के संरक्षण में रहने वाले कवियों ने उनकी रुचि के अनुसार श्रृंगारिक और दरबार आधारित रचनाएँ कीं, जिससे देशभक्ति और वीरता की भावनाएँ कम हो गईं।
सामाजिक और धार्मिक गिरावट: धर्म के मूलभूत सिद्धांतों से दूर होकर बाह्याचरण को महत्व दिया जाने लगा, और वैष्णव संप्रदाय के लोभी पीठधीश भी राजाओं को दीक्षा देकर ऐश्वर्य-विलास में लिप्त हो गए।
आर्थिक अव्यवस्था: देश में युद्ध और गृह कलह के कारण आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई, और राजाओं के पास कवियों को संरक्षण देने के लिए पर्याप्त साधन नहीं रहे।
🔴 39. केशवदास का जन्म कब हुआ?
✅ आचार्य केशवदास का जन्म 1555 ईस्वी में ओरछा में हुआ था।
केशवदास एक प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान और हिंदी कवि थे, जिन्होंने रीतिकाल में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
वे अपनी रचनाओं के लिए जाने जाते हैं, जैसे कि रसिकप्रिया।
उन्हें कई बार "कठिन काव्य का प्रेत" भी कहा जाता है।
🔴 40. केशवदास के ग्रन्थ कौन कौनसे है?
✅ केशवदास के नौ प्रामाणिक ग्रंथ हैं: रसिकप्रिया, कविप्रिया, नखशिख, छंदमाला, रामचंद्रिका, वीरसिंहदेव चरित, रतनबावनी, विज्ञानगीता, और जहाँगीर जसचंद्रिका. रसिकप्रिया उनकी प्रौढ़ रचना है जिसमें रस, वृत्ति और काव्यदोषों का विशद वर्णन है, जबकि कविप्रिया इन्द्रजीत सिंह की प्रेमिका गणिका प्रवीण राय को शिक्षा देने के लिए लिखी गयी थी.
केशवदास के प्रमुख ग्रंथ:
रसिकप्रिया: यह एक रीति काव्य-ग्रंथ है जिसमें रस, वृत्ति और काव्य-दोषों का विवेचन किया गया है.
कविप्रिया: इस ग्रंथ को इन्द्रजीत सिंह की प्रेमिका प्रवीण राय के लिए लिखा गया था.
रामचन्द्रिका: यह रामायण का एक संक्षिप्त अनुवाद है, जिसमें ३० खंड हैं.
नखशिख: यह एक लक्षण ग्रंथ है जो नायिका के नख (पैर के नाखून) से शिख (सिर) तक के वर्णन से संबंधित है.
छंदमाला: यह एक छंद-शास्त्र पर आधारित ग्रंथ है.
वीरसिंहदेव चरित: यह ओरछा के राजा वीरसिंह देव के जीवन पर आधारित ग्रंथ है.
रतनबावनी: यह केशवदास की प्रारंभिक रचनाओं में से एक है जिसमें बुंदेला राजा रत्नसेन के शौर्य का वर्णन है.
विज्ञानगीता: यह भी केशवदास की महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है.
जहाँगीर जसचंद्रिका: यह जहांगीर के यश का वर्णन करने वाला ग्रंथ है.
🔴 41. मतिराम ग्रंथावली की आलोचनात्मक भमिका किसने लिखी है?
✅ प्रस्तुत ग्रंथ 'मतिराम-ग्रंथावली' पं० कृष्णविहारीजी मिश्र की वह महती कृति है, जिसके प्रकाशन के पश्चात् मिश्रजी की गणना हिंदी के अग्रणी समालोचकों में की जाने लगी थी।
🔴 42. शुक्ल जी ने रीतिकाल का अन्तिम श्रृंगारी कवि किसे माना है?
✅ आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रीतिकाल के किसी भी एक कवि को "अंतिम श्रृंगारी कवि" नहीं माना है। उन्होंने घनानंद को रीतिमुक्त धारा का अग्रणी कवि माना और चिंतामणि को रीतिकाल का प्रवर्तक कहा था। रीतिकाल की विशेषता श्रृंगार रस की प्रचुरता थी, जिसके कारण इसे श्रृंगार काल भी कहा जा सकता है।
विस्तार से:
घनानंद: आचार्य शुक्ल ने घनानंद को रीतिमुक्त काव्यधारा का अग्रणी कवि माना है, जो श्रृंगार रस में प्रवाहपूर्णता और हृदय की पीर को दर्शाते हैं।
चिंतामणि: शुक्ल जी ने चिंतामणि को रीतिकाल का प्रवर्तक माना है, जो रीतिकाल के कवियों की परंपरा स्थापित करने वाले थे।
रीतिकाल का "अंतिम" कवि: शुक्ल जी ने रीतिकाल के अंत का निश्चित निर्धारण अलग से नहीं किया है, न ही किसी एक कवि को "अंतिम श्रृंगारी कवि" बताया है। उन्होंने रीतिकाल को श्रृंगार रस की प्रमुखता के कारण श्रृंगार काल भी कहा है।
अतः, शुक्ल जी के अनुसार रीतिकाल में एक ही कवि अंतिम श्रृंगारी नहीं था, बल्कि घनानंद को उस विशिष्ट परंपरा का प्रमुख कवि कहा जा सकता है।
🔴 43. रामचन्द्रिका महाकाव्य की रचना किस आधार पर एक ही रात मे हो गई थी?
✅ रामचंद्रिका महाकाव्य की रचना एक रात में होने का आधार एक किंवदंती है, जो कवि केशवदास के अत्यधिक पांडित्य और अलौकिक क्षमता को दर्शाता है, न कि यह वास्तविक ऐतिहासिक तथ्य है. इस किंवदंती के अनुसार, केशव को किसी ऐसे पात्र से शर्त लगी थी कि वे रामकथा को एक ही रात में पूरा कर सकते हैं, जिसे उन्होंने अपनी असाधारण विद्वत्ता और कविता कौशल से पूरा किया.
किंवदंती का विस्तार से विश्लेषण:
अभूतपूर्व पांडित्य और कौशल: यह किंवदंती इस बात पर जोर देती है कि केशवदास को विभिन्न प्रकार के छंदों और पिंगल शास्त्र का इतना गहरा ज्ञान था कि वे कम समय में एक जटिल ग्रंथ लिख सकते थे.
शक्तिशाली संवाद: रामचंद्रिका में संवादों की योजना और उनका सजीव चित्रण भी उनकी प्रतिभा का उदाहरण है, जिससे लगता है कि वे एक ही रात में इसे पूरा कर सकते थे.
आचार्यत्व का प्रदर्शन: यह घटना केशव को हिंदी के पहले आचार्य कवि के रूप में स्थापित करती है, जिन्होंने अपनी रचना के माध्यम से अपने विद्वत्तापूर्ण ज्ञान का प्रदर्शन किया.
सांस्कृतिक पृष्ठभूमि: उस काल में कवियों की अलौकिक शक्तियों और असाधारण प्रतिभाओं की कल्पना आम बात थी, और यह घटना भी उसी सांस्कृतिक संदर्भ में देखी जा सकती है.
निष्कर्ष:
रामचंद्रिका का एक ही रात में लिखा जाना ऐतिहासिक तथ्य नहीं है, बल्कि एक ऐसी किंवदंती है जो केशवदास की असाधारण प्रतिभा और पांडित्य को उजागर करती है.
🔴 44. वृत तरंगिणी ग्रन्थ के कवि कौन है?
✅ वृत तरंगिणी नामक कोई प्रसिद्ध ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है, परन्तु 'राजतरंगिणी' के लेखक कल्हण हैं और 'राग तरंगिणी' के लेखक पंडित लोचन हैं.
अगर आप 'राजतरंगिणी' के बारे में जानना चाहते हैं:
लेखक: कल्हण.
विषय: यह एक संस्कृत महाकाव्य है जो कश्मीर के इतिहास का वृत्तांत है.
अगर आप 'राग तरंगिणी' के बारे में जानना चाहते हैं:
लेखक: पंडित लोचन.
विषय: यह ग्रंथ 16वीं शताब्दी के आसपास लिखा गया था और इसमें उत्तर भारतीय संगीत पद्धति के रागों का विस्तृत वर्णन है.
🔴 45. रसिक गोविन्द किस सम्प्रदाय के रीतिकालीन कवि थे?
✅ रसिक गोविन्द निम्बार्क सम्प्रदाय के रीतिकाल के कवि थे, जो हरिव्यास की गद्दी के शिष्य थे और सर्वेश्वरशरण देव जी से दीक्षा ली थी। इनका कविता काल विक्रम की उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से अंत तक माना जाता है और इनके प्रमुख ग्रन्थ 'रसिक गोविन्द', 'अष्टदेशभाषा', 'कलियुगरासो' और 'युगलरस माधुरी' हैं।
विस्तृत जानकारी
सम्प्रदाय: रसिक गोविन्द ने जयपुर के निकट रहने वाले नीम्वार्क संप्रदायी आचार्य सर्वेश्वरशरण देव से दीक्षा ली थी।
कार्यक्षेत्र: वे रीतिकाल के एक सजीव-सहृदय कवि थे, जिन्होंने भक्ति और रीति दोनों विषयों पर काव्य रचना की।
काल: इनका काव्यकाल सम्बत् 1850 से 1890 (विक्रमी) तक प्रतीत होता है।
कृतियाँ: इनके नौ ग्रंथ ज्ञात हुए हैं, जिनमें 'रामायण सूचनिका', 'रसिक गोविन्द', 'अष्टदेशभाषा', 'पिंगल', 'समयप्रबन्ध', 'कलियुगरासो', 'रसिकगोविन्द', 'लछिमन चंद्रिका' और 'युगलरस माधुरी' प्रमुख हैं।
🔴 46. आधुनिक काल मे घनानन्द ग्रन्थावली का संपादन किसने किया?
✅ आधुनिक काल में घनानंद ग्रंथावली का संपादन विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने किया था। उन्होंने घनानंद की रचनाओं का संकलन कर उन्हें संपादित किया।
विश्वनाथ प्रसाद मिश्र: एक प्रसिद्ध विद्वान थे जिन्होंने घनानंद की रचनाओं को एकत्रित और संपादित किया।
यह संकलन 'घनानंद ग्रंथावली' के नाम से उपलब्ध है और इसमें घनानंद के कवित्त और अन्य रचनाएँ शामिल हैं।
इस कार्य के माध्यम से उन्होंने घनानंद के साहित्य को आधुनिक पीढ़ी तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
🔴 47. हिंदी साहित्य की उतर मध्यकाल रीतिकाल नामक पुस्तक किसकी है?
✅ "हिंदी साहित्य का उत्तर मध्यकाल: रीतिकाल" नामक कोई प्रसिद्ध पुस्तक नहीं है; बल्कि, यह एक सामान्य अवधि है जिसे विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग नामों से संबोधित किया है, जैसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा 'रीतिकाल' और विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा 'शृंगार काल'।
विवरण
रीतिकाल: यह नाम आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा दिया गया है और हिंदी साहित्य के उत्तर मध्यकाल (लगभग 1700-1900 ईस्वी) की उस धारा को संदर्भित करता है जिसमें कविताओं में रस, अलंकार, गुण आदि का विवेचन और रीति ग्रंथों की रचना प्रधान थी।
शृंगार काल: विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इस काल को 'शृंगार काल' नाम दिया, क्योंकि इस युग की अधिकांश रचनाओं में शृंगार रस की प्रधानता थी।
अलंकृत काल: मिश्रबंधुओं ने इस काल को 'अलंकृत काल' कहा है, क्योंकि इस काल में अलंकरण की प्रधानता थी।
संक्षेप में, "हिंदी साहित्य की उत्तर मध्यकाल रीतिकाल नामक पुस्तक" किसी व्यक्ति की रचना नहीं है, बल्कि यह उत्तर मध्यकाल की एक साहित्यिक प्रवृत्ति का नाम है जिसे विभिन्न साहित्यकारों ने अलग-अलग नामों से पुकारा है।
🔴
48. हरिचरणदास ने बिहारी सतसई की टीका किस नाम से लिखी है?
✅ हरिचरणदास ने बिहारी सतसई की टीका "सत्सई-टीका" या "बिहारी-सतसई टीका" नाम से लिखी थी.
विस्तार से:
कवि हरिचरणदास द्वारा लिखी गई बिहारी सतसई की टीका को "सत्सई-टीका" या "बिहारी-सतसई टीका" के नाम से जाना जाता है.
संबंधित जानकारी:
बिहारी सतसई रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि बिहारीलाल की रचना है, जिसमें नीति, भक्ति और शृंगार से संबंधित दोहों का संकलन है.
बिहारी सतसई की अनेक टीकाएँ लिखी गई हैं, जिनमें हरिचरणदास की टीका भी एक प्रमुख टीका है.
🔴 49. किस कवि ने वीर रसात्मक प्रबंध काव्य लिखा है?
✅ रामधारी सिंह 'दिनकर' के साहित्य जगत में दिए योगदानों के चलते वीर रस का महानतम हिंदी कवि माना गया और उन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि भी दी गई।, साहित्य और काव्य पर अपने चिंतन पर ‘दिनकर’ ने क्या कहा, सुनें।, ...कवि भूषण ने वीर रसात्मक प्रबंध काव्य लिखे हैं, और उन्हें वीर रस का प्रमुख कवि माना जाता है. उनकी कविताओं में ओज और जोश भरपूर होता है, और उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज के समय में उनकी वीरता का वर्णन किया है.
भूषण के बारे में कुछ मुख्य बातें:
वीर रस के कवि: भूषण को हिंदी साहित्य में वीर रस का प्रतिनिधि कवि कहा जाता है.
ओजपूर्ण कविताएँ: उनकी कविताओं में ओज (प्रबलता) है, जो वीर रस की कविता का एक स्थायी भाव है.
समकालीनता: भूषण अपने काल में छत्रपति शिवाजी महाराज के समकालीन थे, जिनकी वीरता का उन्होंने अपने काव्य में वर्णन किया है.
प्रबंध काव्य: उन्होंने जो काव्य लिखे, वे वीर रस से परिपूर्ण प्रबंधकविताएँ थीं, जो वीर काव्य परंपरा के तहत आती हैं.
🔴 50. रीतिकाल को रीतिकाव्य किसने कहा है?
✅ रीतिकाल को "रीति काव्य" के नाम से डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन ने पुकारा है. हालांकि, आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस काल को रीतिकाल नाम दिया और इस शब्द का व्यापक अर्थ ग्रहण किया. वहीं, मिश्रबंधुओं ने इसे अलंकृत काल कहा, और आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे श्रृंगार काल नाम दिया है.
नामकरण का संदर्भ:
डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन: उन्होंने रीतिकाल के स्वरूप को देखते हुए इसे "रीति काव्य" कहा, जो काव्य की पद्धतियों और नियमों के विवेचन पर आधारित था.
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: उन्होंने इस काल को "रीतिकाल" नाम दिया, जिसमें उन्होंने 'रीति' शब्द के व्यापक अर्थ को शामिल किया, जैसे रस, अलंकार, गुण आदि का विवेचन.
मिश्रबंधु: उन्होंने अलंकृतियों की प्रधानता के कारण इस काल को "अलंकृत काल" नाम दिया.
आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र: उन्होंने श्रृंगार रस की प्रधानता को देखते हुए इसे "श्रृंगार काल" कहा.
संक्षेप में, रीतिकाल के लिए विभिन्न नाम दिए गए हैं, जिनमें से "रीति काव्य" नाम डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन का है.
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आज के कवि विशेष
2. कवि स्वयंभू
- कवि स्वयंभू (Mahākavi Swayambhu / स्वयंभू देव) प्राचीन भारत के एक महत्वपूर्ण कवि हैं
- विशेषकर अपभ्रंश भाषा एवं जैन साहित्य परंपरा से सम्बन्ध रखते हुए। नीचे उनके जीवन, भाषा, काल, रचनाएँ और साहित्यिक महत्त्व विस्तार से प्रस्तुत है:
जीवन‑परिचय एवं काल
- स्वयंभू के पिता का नाम मारुतदेव तथा माता का नाम पद्मिनी था।
- उनके कुछ पुत्र भी थे; सबसे छोटे को त्रिभुवन स्वयंभू कहा जाता है।
- उनका साहित्य और भाषा‑प्रयोग देखकर और अन्य अभिलेखों से विरुपताएँ निकालकर ये अनुमान किया जाता है कि उनका जीवन काल 8वीं शताब्दी के प्रथम भाग में था, लगभग ईस्वी सन् 677‑783 के बीच।
- जन्मतिथि, जन्मस्थान, मृत्यु की तिथि आदि जीवन‑घटनाएँ विशेष रूप से ज्ञात नहीं हैं।
भाषा एवं साहित्यिक परिवेश
- स्वयंभू अपभ्रंश भाषा के कवि माने जाते हैं। अपभ्रंश भाषा, प्राकृत से निकली और हिन्दी की प्रारंभिक‑मध्यकालीन भाषाएँ बनने की ओर अग्रसर भाषा है।
- उन्हें “अपभ्रंश का वाल्मीकि” कहा जाता है क्योंकि उन्होंने रामकथा जैसे महान काव्य विषय को अपभ्रंश में लिखा, जो बाद में हिंदी आदि भाषाओं के काव्य विकास में प्रभावशाली रहा।
- कहा जाता है कि उन्होंने दक्षिण भारत एवं उत्तर भारत की सीमा‑भूमि में रहते हुए रचना की; यह उनकी भाषा एवं भावावली में विविधता एवं लोकभाषा की झलक दिखाती है।
रचनाएँ
स्वयंभू की कुछ प्रमुख और उपलब्ध रचनाएँ निम्नलिखित हैं:
| रचना का नाम | विषय / कथा | भाषा / विशेषताएँ |
|---|---|---|
| पउमचरिउ (Paumchariu या पद्मचरित) | यह रामकथा पर आधारित महाकाव्य है। इसमें राम‑चरित्र का विस्तृत वर्णन है, अंत में राम को जैन आदर्शों के अनुसार निर्वाण प्राप्त होता दिखाया गया है। | यह पाँच कांडों (खंडों) में बँटा हुआ है; भाषा अपभ्रंश; प्रस्तुति एवं मनोभाव में जैन आदर्शों का समावेश है। |
| रिट्ठणेमिचरिउ (अरिष्टनेमिचरिउ / हरिवंश पुराण) | यह महाभारत की कथा या कृष्ण‑कथा से सम्बद्ध है। | साहित्यिक दृष्टि से यह भी महाकाव्य श्रेणी में है; भाषा एवं शैली अपभ्रंश। |
| स्वयंभू छंदस् | यह छंद‑शास्त्र सम्बन्धी रचना है; प्राकृत और अपभ्रंश छंदों पर विचार एवं विश्लेषण इसमें मिलता है। |
- कुछ स्रोतों में यह उल्लेख है कि “पंचमोचरित (नागकुमार चरित)” भी कभी‑कभी स्वयंभू की रचनाओं में शामिल माना जाता है, लेकिन उसकी पुष्टि नहीं हुई है।
- मुख्यतः तीन रचनाएँ आज उपलब्ध हैं — पउमचरिउ, रिट्ठणेमिचरिउ, और स्वयंभू छंदस्।
साहित्यिक महत्व एवं प्रभाव
- स्वयंभू को जैन साहित्य एवं अपभ्रंश साहित्य में एक आदिकालीन महाकवि माना जाता है। उनकी भाषा प्रयोग में ऐसी विशेषताएँ हैं जो बाद की हिन्दी‑भाषाओं के साहित्य की नींव कही गई हैं।
- उनका “पउमचरिउ” ग्रंथ अपभ्रंश में लिखे महाकाव्यों में सर्वप्राचीन, विशाल एवं उत्कृष्ट माना जाता है।
- तुलसीदास आदि बाद के कवियों पर उनका प्रभाव माना जाता है, विशेषकर रामकथा के विषय तथा भाषा‑आसक्ति के कारण।
- उनकी दृष्टि जैन‑आदर्शों से प्रभावित है, जैसे अहिंसा, निर्वाण, आत्मसंयम आदि विषय; इसलिए उनकी रामकथा भी पारंपरिक हिंदू रामायण से भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
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