देवरानी-जेठानी की कहानी'

 उपन्यास के प्रमुख पात्र


सर्वसुख यह उपन्यास का प्रमुख पात्र है तथा मेरठ का एक प्रसिद्ध बनिया है, जो समय-समय पर उपन्यास की कथा को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


छोटेलाल छोटेलाल उपन्यास का मुख्य तथा सर्वसुख का छोटा बेटा है। वह पढ़ा-लिखा समझदार पात्र है।


छोटी बहू (देवरानी) छोटेलाल की पत्नी तथा उपन्यास की प्रमुख नारी पात्र है, जो पढ़ी-लिखी होने के साथ-साथ समझदार भी है। यह उपन्यास में जगह-जगह अपनी समझदारी का परिचय देती है।


दौलतराम दौलतराम सर्वसुख का बड़ा बेटा है।


ज्ञानो (जेठानी) ज्ञानो दौलतराम की पत्नी तथा घर की बड़ी बहू है जो अनपढ़ है। वह सदैव अपनी सास तथा देवरानी की आलोचना करती है।


इनके अतिरिक्त पार्वती तथा सुखदेई (सर्वसुख की बेटियाँ) दौलतराम, ज्ञानो (जेठानी), नन्हें, मोहन आदि पात्र भी उपन्यास की कथा को आगे बढ़ाने तथा रोचक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


'देवरानी-जेठानी की कहानी' उपन्यास की समीक्षा


'देवरानी-जेठानी की कहानी' पुनर्जाग्रण की चेतना से सीधी जुड़ी हुई रचना है। पुनर्जागरण ने भारतीय समाज के जिस पक्ष को सबसे अधिक झकझोरा था, वह उसका नारी-विषयक् दृष्टिकोण और उसके प्रति उसका व्यवहार था। अशिक्षा के कारण मध्यवर्गीय परिवारों की स्त्रियों की स्थिति दयनीय थी। नारी शिक्षा सामाजिक परिवर्तन में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।


उपन्यास में 'सर्वसुख नाम का एक बनिया है, जिसके दो पुत्र (दौलत और छोटेलाल) तथा दो पुत्रियाँ (पार्वती और सुखदेई हैं। सर्वसुख के बड़े बेटे दौलत की पत्नी बड़ी बहू (ज्ञानो) है तथा छोटे बेटे 'छोटेलाल' की पत्नी छोटी बहू के नाम से जानी जाती है। छोटी बहू (देवरानी पढ़ी-लिखी तथा समझदार है जबकि बड़ी बहू (जेठानी) अनपढ़ है तथा सदैव अपनी सास तथा देवरानी की आलोचना करती है।


छोटी बहू संस्कारी थी उसे धन सम्पत्ति तथा जायदाद का कोई लालच नहीं था, किन्तु बड़ी बहू लालची स्वभाव की थी। अपने लालची स्वभाव के कारण ही उसने अपने पति दौलतराम और सास को छोटी बहू के विरुद्ध भड़काकर घर का बँटवारा करवा दिया। उपन्यास के अन्त में भी उसकी स्वार्थ प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। जब जायदाद के बँटवारे में मण्डी की दुकान दौलतराम के हिस्से में आई थी, तब भी बड़ी बहू खुश नहीं थी, क्योंकि वह छोटेलाल के हिस्से में हवेली आने की बात पर वह मन ही मन असन्तुष्ट थी। इसलिए हवेली से जाते समय वह दो खिड़कियों के दरवाजे तथा चौखट उतार कर अपने साथ ले गई। इससे स्पष्ट होता है कि व्यक्ति को चाहे जितनी भी धन-सम्पत्ति मिल जाए, परन्तु वह दूसरों की सम्पत्ति देखकर कभी खुश नहीं रह सकता।]


तत्कालीन समाज में बाल विवाह का प्रचलन था, किन्तु छोटेलाल और उसकी बहू (छोटी बहू) ने अपने पुत्रों का बाल-विवाह न कराकर उनकी पढ़ाई-लिखाई पर अधिक ध्यान दिया। 'नन्हें' (छोटी बहू और छोटेलाल का पुत्र) की सगाई कई जगह से आई, किन्तु छोटेलाल और उसकी बहू ने सगाई वापस कर दी। पुराने समाज में यह बहुत बड़ी बात थी, किन्तु छोटेलाल और उसकी पत्नी ने समाज के, विपरीत जाकर यह निर्णय लिया। इसके साथ ही उस समय विधवा विवाह का प्रचलन भी नहीं था। यदि किसी स्त्री का पति अल्पायु में स्वर्ग-सिधार जाए तो उसकी पत्नी को पुनर्विवाह का कोई अधिकार नहीं था, किन्तु इस उपन्यास में छोटेलाल की बहू की मामा की बेटी, जिसका नौ वर्ष की आयु में विवाह हुआ था, उसका पति पतंग उड़ाते हुए छत से नीचे गिर गया और उसकी मृत्यु हो गई। इस कारण वह मात्र 10 वर्ष की अवस्था में विधवा हो गई, उसने अपने जीवन के सब रास-रंग खो दिए, जिसके अभी खेलने-खाने के दिन थे, वह दिन उसको कठिनाई में बिताने पड़े। छोटेलाल की बहू के प्रयासों से उसका पुनर्विवाह कराया गया।


'देवरानी-जेठानी की कहानी' की भाषा का जनभाषा से सहज जुड़ाव, किस्सागोई अर्थात् कथा कहने के तरीके (शब्द में ही छिपे हुए अर्थ) का अनूठा संस्कार, लोकभाषा के अर्थगर्भित शब्दों का सचेत प्रयोग, बोलचाल और उसमें मुहावरेदार लोकोक्तियों का जुड़ाव - ये सब विशिष्टताएँ उपन्यास की कथा की भाषा का सृजन करती हैं। इसके साथ ही पण्डित गौरीदत्त ने अपने उपन्यास में बोलचाल के शब्द युग्मों का सफल प्रयोग भी किया है; जैसे - "और जब कभी भाव चढ़ा देखता तो हजार का नाज-पात लेकर दुकान में डाल देता और फायदा देख उसे बेच डालता। ब्याज-बट्टा और गिरवी-पाते की भी उसे बहुतेरी आमदनी थी। हाट-हवेली, धन-दौलत, दूध-पूत, परमेश्वर का दिया उसके पास सब कुछ था।" इस आधार पर कहा जा सकता है कि 'देवरानी-जेठानी की कहानी' निश्चय ही नए समय की ऐसी पुस्तक है, जिससे आज का उपन्यास लेखक भी कुछ दिशा-निर्देश पा सकता है। पण्डित गौरीदत्त ने अपनी इस कृति से स्पष्ट कर दिया है कि वे इसकी रचना स्त्री-शिक्षा के लिए ही कर रहे थे। इस तरह यह उपन्यास हमारी हिन्दी भाषा के लिए एक अनमोल धरोहर है।




पंडित गौरीदत्त

पंडित गौरीदत्त का जन्म पंजाब प्रदेश के लुधियाना नगर में सन् 1836 ईस्वी में हुआ था।


रुड़की के इंजीनियरिंग कॉलेज से बीजगणित, रेखागणित, सर्वेइंग, ड्राइंग और शिल्प आदि की शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत आपने फ़ारसी और अँग्रेज़ी का भी विधिवत् ज्ञान अर्जित किया।

गौरीदत्त ने ‘नागरी-सौ अक्षर’ 'अक्षर दीपिका’, ‘नागरी की गुप्त वार्ता’, ‘लिपि बोधिनी’, ‘देवनागरी के भजन’ और ‘गौरी नागरी कोष’, 'नागरी और उर्दू का स्वांग', ‘देवनागरी गजट’ तथा ‘नागरी पत्रिका’ नामक पत्र का संपादन तथा प्रकाशन भी किया था।

‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना (16 जुलाई सन् 1893) से पूर्व ही सन् 1892 में देवनागरी प्रचारक’ नामक पत्र का संपादक एवं प्रकाशन करके हिंदी-प्रचार के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

देवरानी जेठानी की कहानी :


इस उपन्यास का प्रकाशन 1870 ई. में मेरठ के एक लीथो प्रेस ‘छापाख़ान-ए-जियाई’ में प्रकाशित हुआ।

डॉ. गोपाल राय व डॉ. पुष्‍पपाल सिंह आदि ने पं गौरीदत्‍त रचित ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ को हिंदी का पहला उपन्‍यास होने का गौरव प्रदान किया है।

हिंदी उपन्‍यास कोश (1870–1980) के कोशकारों संतोष गोयल, उषा कस्‍तूरिया और उमेश माथुर ने भी ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ को हिंदी का पहला उपन्‍यास मानते हुए अपने कोश की शुरुआत ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ के प्रकाशन वर्ष सन् 1870 ई से ही की है।

गोपाल राय ने ‘हिंदी उपन्यास का इतिहास’ में लिखा है कि—देवरानी जेठानी की कहानी की रचना उपन्यास के रूप में नहीं, बल्कि बालिकाओं के लिए उपयोगी पाठ्य पुस्तक के रूप में हुई थी। उनके अनुसार इस उपन्यास का मक़सद स्त्री-शिक्षा का विकास और आदर्श स्त्री चरित्र को प्रस्तुत करना था। इसी परंपरा में वामा शिक्षक (1872) और भाग्यवती (1877) पुस्तकें भी लिखीं गई थीं। ‘स्त्री-उद्वार भारतीय नवजागरण का प्रमुख मुद्दा था जिसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति इन कथा पुस्तकों में हुई।’

पात्र : सर्वसुख, पार्वती, सुखदेई, दौलतराम, छोटेलाल, ज्ञानो,  

कन्हैया, नन्हे


सर्वसुख- सर्व सुख उपन्यास का नायक है, जो मेरठ का रहने वाला अग्रवाल बनिया है, जिसकी मंडी में आढ़त की दुकान है।

पार्वती- सर्वसुख की बड़ी बेटी जो कि दिल्ली में विवाहित हैं।


सुखदेई- यह सर्वसुख की छोटी बेटी है।

दौलतराम- दौलतराम सर्वसुख का बड़ा बेटा है।


छोटेलाल- छोटेलाल सर्वसुख का छोटा बेटा है।

ज्ञानो- बड़ी बहू अर्थात जेठानी, जो दौलतराम की पत्नी है। यह लालची स्वभाव की है, जिसके कारण अपने पति दौलतराम और सास को छोटी बहू के ख़िलाफ़ भड़काकर घर का बँटवारा करवा देती है। छोटी बहू अर्थात देवरानी—जो छोटेलाल की पत्नी है। यह ज्ञानो अर्थात अपनी जेठानी की तरह लालची नहीं है।


कन्हैया- दौलतराम का पुत्र

नन्हे- छोटेलाल का बड़ा बेटा

मोहन- छोटेलाल का छोटा बेटा


शिवदयाल- सुखदेई का बेटा

वंशीधर कबाड़ी- इनके यहाँ सुखदेई का विवाह हुआ है।


ज्ञानचंद- सुखदेई का भानजा

डूंगर- ज्ञानो का पिता, जो एक ग़रीब बनिया है।


तहसीलदार- आनंदी का पिता

राम प्रसाद- आनंदी का बड़ा भाई


गंगाराम- आनंदी का छोटा भाई

भगवानदेई- आनंदी की छोटी बहन


दिल्ला पांडेय- पुरोहित

मिसरानी- दिल्ला पांडेय की पत्नी


मुंशी टिकट नारायण- शहरी अमीर

हर सहाय काबली- शहरी अमीर


अन्य पात्र- लालदीन दयाल, किरपी(बाल विधवा), झल्ला मल्ल, लाला बुलाकीदास (मदरसे में नौकर)



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