हिन्दी साहित्य सागर के समान है जिसमें अनगिनत अनमोल मोती भरे पड़े हैं, आवश्यकता है उस अथाह सागर में डुबकी लगाकर उसे खोज लाने की। हिन्दी साहित्य में शोधकर्ताओं ने यह दुर्लभ कार्य समय-समय पर किया है जिससे आश्चर्यचकित कर देने वाले तथ्य हमारे समक्ष आते रहे हैं। इसी श्रृंखला में पण्डित गौरीदत्त द्वारा लिखित 'देवरानी जेठानी की कहानी' नामक उपन्यास को लिया जा सकता है। इस उपन्यास का प्रकाशन सन् 1870 में मेरठ के एक लीथो प्रेम 'छापाखान-ए-जियाई' में हुआ था। तब इसकी 500 प्रतियाँ ही छापी गई थीं जिसका मूल्य मात्र बारह आने था। छोटे आकार के इस उपन्यास में कुल 35 पृष्ठ हैं। इसकी प्रति आज भी नेशनल लाइब्रेरी, कलकत्ता में सुरक्षित है।

'देवरानी जेठानी की कहानी' नामक उपन्यास का पुनः प्रकाशन डॉ० गोपाल राय ने किया और उपन्यास के सन्दर्भ में लिखा कि "1870 में 'देवरानी जेठानी की कहानी' (पं. गौरीदत्त) के रूप में एक नया फूल खिला, जो हिन्दी-उपन्यास का आरम्भ बिन्दु सिद्ध हुआ।..... देवरानी जेठानी की रचना उपन्यास के रूप में नहीं बल्कि बालिकाओं के लिए उपयोगी पाठ्यपुस्तक के रूप में हुई थी। सरकारी सहायता से देवरानी जेठानी का लेखन और मुद्रण हुआ।" 19वीं सदी के मध्यमवर्गीय बनिया समाज के जीवन के यथार्थ चित्रों के लबरेज से युक्त इस उपन्यास में बनिया-समाज की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक स्थिति के साथ-साथ, स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह, बाल विवाह, बच्चों के लालन-पालन, टीकाकरण, रूढ़िवादिता इत्यादि के चित्रण के साथ-साथ अन्धविश्वास से दूर रहने का महत् सन्देश रूपायित हुआ है। इस उपन्यास में अंग्रेजी-शिक्षा के साथ-साथ नागरी-शिक्षा पर भी उपन्यासकार का फोकस है। तमाम प्रकार की सामाजिक, धार्मिक कुरीतियाँ यथा-अंधविश्वास, बीमारी दूर करने के लिए टोना टोटका, शीतला माँ के नाराज जाने के भय से चेचक का टीका न लगवाना आदि।

हिन्दी का पहला को कहानी (1830) "परीक्षासुर (1882), इस पर विद्वानों में महर है। जहाँ डॉ. नगेंद्र और डॉ. निर्मला जैन 'परीक्षा' को हितों का पहला भौलिक है, वहाँ होला पुल सिंह नदिने पं गौरीवरचित देवरानी की कहानी को हिन्दी का उन्होने का गौरमप्रातकिया है।

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