रामचन्द्र शुक्ल के महत्त्वपूर्ण कथन
भाग - 1
1. ग्रियरसन की पुस्तक द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ़ नॉर्दर्न हिन्दुस्तान को 'बड़ा वृत संग्रह' कहा है।
2. 'शिवसिंह सरोज' व 'इस्त्वार द ला लितरेत्युर ऐन्दुई ऐ ऐन्दुस्तानी' रचना को 'वृत संग्रह' मात्र कहा है।
3. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'मिश्रबंधु विनोद' पुस्तक को 'बड़ा भारी कवि वृत संग्रह / प्रकांड कवि वृत्त संग्रह' तथा मित्र बंधुओं को 'परिश्रमी संकलनकर्ता' कहा है।
4. इन्होनें 'क्रोचे ' के 'अभिव्यंजनावाद' एवं 'कुंतक' के 'वक्रोक्तिवाद' का तुलनात्मक विवेचनर करके अभिव्यंजनावाद को भारतीय वक्रोक्तिवाद का विलायती उत्थान ' कहा है।
5. शुक्ल ने कबीर की भाषा को 'सधुक्कड़ी भाषा' कहा ।
6. "साधना के क्षेत्र में जो ब्रह्मा है साहित्य के क्षेत्र में वही रहस्यवाद है ।"
7. आचार्य शुक्ल ने सूफी कवियों की प्रेम पद्धति में 'प्रेम की पीर' को महत्त्वपूर्ण माना है। 'तुलसी' को हिंदी का सर्वश्रेष्ठ कवि सिद्ध किया है।
8. इन्होने सूरदास को 'जीवनोत्सव का कवि' कहा तथा इसके भ्रमरगीत को 'ध्वनि काव्य" की संज्ञा दी।
9. शुक्ल जी ने 'रासपंचाध्यायी' रचना पर नंददास को 'जड़िया कवि' की उपाधि प्रदान की।
10. शुक्ल जी ने पद्मावती में रतन सेन द्वारा पद्मावती को प्राप्त करने की इच्छा को प्रेम न कहकर 'रूप लोभ' की संज्ञा दी।
11. सूरदास किसी चली आती हुई गीति काव्य परंपरा का चाहे वह मौखिक ही रही हो पूर्ण विकास सा प्रतीत होता है। "
12. "सूरदास की भक्ति का मेरुदंड पुष्टीमार्ग ही है।"
13. "सूर वात्सल्य और वात्सल्य सूर।"
14. आचार्य शुक्ल और डॉ. रामकुमार वर्मा ने विद्यापति को 'शुद्ध श्रृंगारी' कवि माना है।
15. घनानंद को 'लाक्षणिक मूर्तिमत्ता' और 'प्रयोग वैचित्र्य का कवि' तथा 'साक्षात् रस मूर्ति ' का कवि कहा है।
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