रीतिकाल के प्रमुख कवि 

 

1. चिंतामणि त्रिपाठी –

ये रत्नाकर त्रिपाठी के पुत्र तथा तिकवाँपुर ,जिला- कानपुर के निवासी थे | परम्परा से प्रसिद्ध है कि भूषण ,मतिराम तथा जटाशंकर इनके भाई थे जो प्रसिद्ध कवि भी थे | इस पर भी विद्वानों में विवाद है |इनका जन्म काल 1609 ई. के लगभग तथा मृत्यु काल 1680-85 ई. के आस –पास है | ये सूर्यवंशी शाहजी भोसला ,शाहजहाँ तथा दारा शिकोह के आश्रम में रहे | इनकी रचना निम्न है ‌-

1. छंद विचार पिंगल

2. काव्य विवेक

3. कविकुलकल्पतरु

4. काव्य प्रकाश

5. रामायण


2. केशवदास [1555 ई. -1617 ई. ]

– आचार्य केशव दस का ओरछा नरेश महराज रामसिंह के भाई इंद्रजीत सिंह की सभा में रहते थे | जहां उन्हे वहाँ बहुत सम्मान मिलता था | ये ब्राह्मण कृष्ण दत्त के पौत्र और काशीनाथ के पुत्र थे | पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र केशव को प्रथम आचार्य मानते है |केशव ने पहली बार काव्यांगों पर विचार किया तथा संस्कृत की परम्परा की स्थापना भी पहली बार की है | आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने केशव की कविता में दुरुहता और अस्पष्टता का आरोप लगाया है तथा केशव को “ कठिन काव्य का प्रेत “ कहा जाता है |केशव कवि और आचार्य दोनों थे | आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने केशव को रीतिकाल में स्थान न देकर भक्तिकाल में सगुण धारा(राम भक्ति ) में स्थान दिया है परंतु केशव दास का वर्णन रीतिकाल में करना ही उचित है | केशव दास की रचनाओं का वर्णन निम्न है –

1. कविप्रिया – यह अलंकार से संबंधित शाष्त्रीय ग्रंथ है | कहा जाता है कि केशवने इसकी रचना अपनी साहित्य शिष्या राय प्रवीण के लिये की थी | प्रवीणराय केशव के आश्रय दाता इंद्रजीत सिंह के दरबार की गणिका थी |

2. रसिक प्रिया – यह रस सम्बंधी शास्त्रीय ग्रंथ है | इस इस ग्रंथ में नायिका भेद का वर्णन किया गया है | श्रृंगार रस की प्रमुखता है |

3. रामचंद्रिका – यह केशव की भक्तिपरक रचना है | इसमें 115 प्रकार के छंद है | रामचंद्रिका को छंदों का अजायबघर कहा है |

4. छंदमाला – इसमें छंदों का वर्णन किया गया है |

5. वीरसिंह देव चरित – यह एक प्रशस्ति काव्य है |

6. जहागीर जस चंद्रिका – यह भी एक प्रशस्ति काव्य है |

7. रतन बावनी 

8. विज्ञान गीता

9. नखशिख 

केशव को अलंकारवादी कवि कहने के पीछे उन्ही का एक दोहा उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत है –

जदपि सुजाति सुलच्छनी , सुबरन सरस सुवृत्त |

भूषण बिनु न विराजई , कविता बनिता मित्त ||


3. कुलपति मिश्र –

ये आगरा के रहने वाले माथुर चौबे थे | इनके पिता का नाम परशुराम मिश्र था | कहा जाता है कि हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि बिहारीलाल इनके मामा थे | कुलपति मिश्र जी जयपुर के महाराज जयसिंह के पुत्र महाराज रामसिंह के आश्रय में रहते थे | इनका कविता काल 1660ई. से 1700 ई. के बीच है | चिंतामणि की परम्परा में आने वाले ये दूसरे प्रमुख आचार्य हैं | ये संस्कृत के विद्वान थे | इनकी रचना है –

1. रसरहस्य

2. संग्रामसार

3. दुर्गाभक्ति चंद्रिका

4. मुक्तितरंगिणी

5. नखशिख 

इनमें प्रथम तीन ही उपलब्ध है | इसमें दुर्गाभक्तिचंद्रिका , दुर्गासप्तशती का पद्यबद्ध अनुवाद है | संग्रामसार ,महाभारत के द्रोणपर्व का तथा रसरहस्य ,मम्मट के ‘काव्यप्रकाश’ का छायानुवाद है |


4. कुमारमणि –

इनका जन्म 1665 ई. के आस –पास हुआ है | ये ध्वनिवादी आचार्य है | चिंतामणि ,कुलपति मिश्र की परम्परा से आते हैं | इनके दो ग्रंथ है –

1. रसिकरंजन (1708 ई.)

2. रसिकरसाल (1719 ई.) |


5. बिहारीलाल-

रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि बिहारी लाल का जन्म 1595 ई. में ग्वालियरके पास बसुवा गोविंदपुर गाँव में हुआ था | इनके पिता का नाम केशव राय था | इनके पिता निम्बार्क सम्प्रदाय के महंत नरहरि दास के शिष्य थे | सन् 1645 ई. के आस पास जब कविवर बिहारी जयपुर के महाराज जयसिंह के यहाँ पहुँचे तो पता लगा कि महाराज अपनी नव विवाहिता रानी के प्रेम में इतना रसलीन हो गए कि राज दरबार देखना ही छोड़ दिया | उस समय बिहारी ने एक दोहा लिख कर महाराज के पास भेजवा दिया जो इस प्रकार है –

नहिं पराग नहिं मधुर मधु , नहिं विकास इहिं काल |

अली कली ही सों विध्यो , आगे कौन हवाल || 

कहा जाता है कि इस दोहे का महाराज के ऊपर इतना प्रभाव हुआ कि वे प्रसन्न होकर बिहारी को काली पहाड़ी नामक ग्राम दान में दे दिया , तथा प्रत्येक दोहे पर स्वर्ण मुद्राएँ देने का संकल्प किया | बिहारी का देहावसान सन् 1663 ई. में हुआ | बिहारी लाल की ख्याति का आधार उनकी एक मात्र रचना “ बिहारी सतसई “ है जिसमे 719 दोहे हैं | निसंदेह बिहारी को रीतिकाल का सर्वश्रेष्ठ कवि कहा जा सकता है | बिहारी ने अलंकार ,रस ,भाव , वक्रोक्ति , ध्वनि ,नायिका भेद ,गुण ,रीति आदि आयामों को ध्यान में रख कर दोहो की रचना की है |



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