5000 हिंदी साहित्य के वन लाइनर प्रश्न -13

 हिंदी साहित्य वन लाइनर - 13


 हिंदी कवियों / लेखकों की महत्वपूर्ण पंक्तियाँ व कथन 

 ⇒ मैंने मैं शैली अपनाई

देखा एक दुःखी निज भाई। –निराला


⇒ व्यर्थ हो गया जीवन

मैं रण में गया हार। (‘वनवेला’) –निराला


⇒ धन्ये, मैं पिता निरर्थक था

कुछ भी तेरे हित न कर सका।

जाना तो अर्थागमोपाय

पर रहा सदा संकुचित काय

लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर

हारता रहा मैं स्वार्थ समर। (‘सरोज स्मृति’) –निराला


⇒ छोटे से घर की लघु सीमा में

बंधे है क्षुद्र भाव,

यह सच है प्रिय

प्रेम का पयोनिधि तो उमड़ता है

सदा ही निःसीम भू पर। (‘पंचवटी प्रसंग’) -निराला


⇒ ताल-ताल से रे सदियों के जकड़े हृदय कपाट

खोल दे कर-कर कठिन प्रहार

आए अभ्यन्तर संयत चरणों से नव्य विराट

करे दर्शन पाये आभार। –निराला


⇒ हाँ सखि ! आओ बाँह खोलकर हम

लगकर गले जुड़ा ले प्राण

फिर तुम तम में, मैं प्रियतम में

हो जावें द्रुत अंतर्धान। –पंत


⇒बीती विभावरी जाग री !

अम्बर-पनघट में डूबो रही

तारा-घट-ऊषा-नागरी। –प्रसाद


⇒ दिवसावसान का समय

मेघमय आसमान से उतर रही है

वह संध्या सुंदरी परी-सी

धीरे-धीरे-धीरे। (‘संध्या सुंदरी’) –निराला


⇒ छोड़ द्रुमों की मृदु छाया

तोड़ प्रकृति से भी माया

बाले तेरे बाल-जाल में

कैसे उलझा दूँ लोचन ? –पंत


⇒ नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में।

(‘कामायनी’) –प्रसाद


⇒ मैं नीर भरी दुःख की बदली –महादेवी


⇒ तुमको पीड़ा में ढूँढा

तुमको ढूँढेगी पीड़ा –महादेवी


⇒ नील परिधान बीच सुकुमार

खुल रहा मृदुल अधखुला अंग

खिला हो ज्यों बिजली का फूल

मेघ बीच गुलाबी रंग। (‘कामायनी’) –प्रसाद


⇒ तोड़ दो यह झितिज, मैं भी देख लूं उस ओर क्या है ?

जा रहे जिस पंथ से युग कल्प, उसका छोर क्या है ? –महादेवी


⇒ स्तब्ध ज्योत्सना में जब संसार

चकित रहता शिशु सा नादान,

विश्व के पलकों पर सुकुमार

विचरते है स्वप्न अजान !

न जाने, नक्षत्रों से कौन ?

निमंत्रण देता मुझको मौन !! (‘मौन निमंत्रण’) –पंत


⇒ ले चल वहाँ भुलावा देकर 

मेरे नाविक ! धीरे-धीरे। 

जिस निर्जन में सागर लहरी 

अम्बर के कानों में गहरी 

निश्छल प्रेम कथा कहती हो 

तज कोलाहल की अवनी रे। (‘लहर’) –प्रसाद


⇒ हिमालय के आंगन में जिसे प्रथम किरणों का दे उपहार –प्रसाद


⇒ राजनीति का प्रश्न नहीं रे आज 

जगत के सम्मुख एक वृहत सांस्कृतिक समस्या जग के निकट उपस्थित –पंत


⇒ छोड़ो मत ये सुख का कण है। -प्रसाद


⇒ आह ! वेदना मिली विदाई। (‘स्कंदगुप्त’) –प्रसाद


⇒ जिए तो सदा उसी के लिए यही अभिमान रहे यह हर्ष निछावर कर दे हम सर्वस्व हमारा प्यारा भारतवर्ष। (‘स्कंदगुप्त’) –प्रसाद


⇒ अरुण यह मधुमय देश हमारा। 

जहाँ पहुँच अनजान झितिज को मिलता एक सहारा। 

(‘चन्द्रगुप्त’) –प्रसाद


⇒ हिमाद्रि तुंग श्रृंग से 

प्रबुद्ध शुद्ध भारती 

स्वयंप्रभा समुज्जवला 

स्वतंत्रता पुकारती 

अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो,

प्रशस्त पुण्य पंथ है-बढ़े चलो, बढ़े चलो। (‘चन्द्रगुप्त’) –प्रसाद


⇒ भारत माता ग्रामवासिनी। –पंत


⇒ भारति जय विजय करे। –निराला


⇒ शेरो की माँद में 

आया है आज स्यार 

जागो फिर एक बार। –निराला


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