5000 हिंदी साहित्य के वन लाइनर प्रश्न -6
अपभ्रंश (आदिकाल) के कुछ महत्वपूर्ण कथन
अपभ्रंश (आदिकाल) के कुछ महत्वपूर्ण कथन
» "जाब ण आप जणिज्जइ, ताव ण सिस्स करेइ । अंधा अंघ कठाव तिम, वेण्ण विकूब पडेइ "॥
-सरहपा (दोहाकोश)
(जब तक आप न जानिए तब तक शिष्य मत बनाइए, अंधा अंधे को निकालने की कोशिश करेगा , तो दोनों ही कूप में गिरेंगे.)
» "जहि मण पवण ण संचरइ, रवि ससि णाह पवेस तहि बट चित्त विसाम करु, सुरेहे कहिअ उबेस "॥
-सरहपा (दोहाकोश)
(जहाँ मन और पवन भी संचार नहीं करते, रवि और शशि का भी प्रवेश नहीं है, हे मूढ़ चित्त वहीं विश्राम करो सुरह ने (यह ) उपदेश दिया है.)
» "आदि ण अंत ण मज्झणउ, णउ भव णउ णिब्बाण | एहु सो परममहासुह, णउ पर णउ अप्पाण "॥
-सरहपा (दोहाकोश)
(जिसका न आदि है, न मध्य है और न अंत है, इसका जन्म और निर्वाण भी नहीं है, यह वह परम महामुख है जिसके लिए न कोई पराया है और न अपना)
» "लोघ गब्बु समुब्बहइ, हउ परमत्ये पवीण । कोटिह मज्झे एक्कु जइ, होइ णिरंजण-लीण"॥
-कण्डपा (दोहाकोश)
(लोग गर्व करते हैं कि हम परमार्थ में प्रवीण हैं, पर करोड़ों के बीच कोई एक ही निरंजन लीन होता है.)
» "सहजे णिच्चल जेण किअ समरसे निअ-मण राअ । सिद्धे सो पुण तक्खणे, णउ जरमरणह स भाअ।।"
-कण्डपा (दोहाकोश)
(समरस में अपना मन अनुरक्त करके जिन्होंने सहज में निश्चल किया वह तत्क्षणात् सिद्ध है उसे जरा मरण का भय नहीं रहता.)
» "काई बहुत्तई जंपिअइँ, जं अप्पणु पंडिकूलु । काइ मि परहु ण तं करहि, एहु जु धम्मह मूलु॥"
-देवसेन
(बहुत कल्पना करने से क्या लाभ ? जो अपने प्रतिकूल हो अर्थात् जो स्वयं को बुरा लगे वह दूसरों के लिए मत कहो, मत करो. यही धर्म का मूल है.)
» "सत्त वि महुरई उबसमइ, सयल वि जिय वसि हुल।"
-देवसेन
(शत्रु भी मधुरता से शांत हो जाता है और सभी जीव वश में हो जाते हैं.)
» "जसु पवसंत ण पवसिआ. मुइअ विओइ ण जासु । लज्जिज्जउ संदेसउउ, दिंती पहिय पियासु।"
-अब्दुर्रहमान (संदेशरासक)
(हे पथिक, जिसके प्रवास करते प्रवाह नहीं किया और जिसके वियोग में मरी ही, उस प्रिय को संदेश देती हुई लज्जित हो रही हूँ।)
» "जो जाया झाग्गियए, कम्म कलंक डहेवि । णिच्च-णिरंजण-णाणमय, ते परम्प णवेवि|"
- जोइंदु (परमातम प्रकाश )
(जो ध्यानाग्नि से कर्म कलंकों को जलाकर नित्य निरंजन ज्ञानमण हो गए हैं उन परमात्य को नमन करता हूँ.)
» "रावण जायउ जहि दह मुह एक सरीरु । चिंताविय तइयहि जणणि कवणु पियावउँ खीरु।"
- सोमप्रभ सूरि (कुमारपाल प्रतिबोध)
(जिस दिन दस मुँह एक शरीर वाला रावण उत्पन्न हुआ तभी माता चिंतित हुई कि दूध किसमें पिलाऊँ.)
» "मणि पणट्ठइ जइ न तणु, सो देसडा चइज्ज । मा दुज्जन कर पल्लविहिं, दंसिज्जंतु भमिज्ज।"
-सोमप्रभ सूरि (कुमारपाल प्रतिबोध)
(मान नष्ट होने पर यदि तन नहीं तो देश अवश्य त्याग दीजिए, दुर्जन के कर पल्लवों से दिखलाए जाते मत घूमिए.)
¡ » "भल्ला हुआ जुमारिया, बहिणि महारा कंतु । लज्जयू तू वयंसिअहु, जड़ भग्गा घर एंतु।"
-हेमचंद्र (प्राकृत व्याकरण)
(बहन भला हुआ जो मेरा कंत मारा गया, यदि वह भागकर आता तो मैं अपनी सखियों में लज्जित हो जाती।)
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