कवि देव सम्पूर्ण परिचय
देव कवि
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--पूरा नाम- देवदत्त
--जन्म - सन 1673 (संवत- 1730)
( 'भावविलास' के ही सक्ष्य पर इनके जन्म संवत् की भी पुष्टि होती है जिसकी रचना इन्होंने संवत् १७४६ में की। वह दोहा इस प्रकार है-
"सुभ सत्रह से छियालिस, चढ़त सोरहीं वर्ष।
कढ़ी देव मुख देवता भावविलास सहर्ष॥")
--जन्म भूमि - कुसमरा, इटावा
--मृत्यु - सन 1768 (संवत- 1825)
--रीतिकाल (रीतिबद्ध कवि)
---प्रमुख रचनाएं:-
- नगेंद्र के अनुसार इनके द्वारा रचित ग्रंथों की कुल संख्या 72 मानी गई हैं।
-(1) भावविलास,1689
( यह इनकी मात्र 16 वर्ष की आयु में रचित सर्वप्रथम रचना मानी जाती है यह औरंगजेब के पुत्र आजम शाह को सुनाई गई थी इसमें श्रृंगाररस, नायक-नायिका भेद एवं 39 प्रकार के अलंकारों का विवेचन किया गया है|)
-(2) अष्टयाम
( इस रचना में दिन के आठ पहरों के बीच होनेवाले नायक-नायिका के विविध विलासों का वर्णन किया गया है|)
-(3) भवानीविलास ( यह रचना भवानी दत्त वैश्य के आश्रय में रची गई थी)
-(4) सुजानविनोद ( सुजानमणि राजा आश्रय में)
-(5) प्रेमतरंग ( इसमें नायक-नायिका भेद श्रंगार रस का वर्णन है)
-(6) रागरत्नाकर ( यह इनका संगीत विषयक लक्षण ग्रंथ है)
-(7) कुशलविलास
( यह रचना फफूंद नरेश राजा कुशल सिंह के आश्रय में रहकर उनकी प्रशंसा में लिखी गई थी)
-(8) देवचरित ( इस प्रबंधकाव्य मे भगवान कृष्ण का चरित्र वर्णन है)
-(9) प्रेमचंद्रिका ( 'मर्दनसिंह' के पुत्र 'राजा उद्योत सिंह वैश्य' के आश्रय में लिखी)
-(10) जातिविलास
-(11) रसविलास ( भोगीलाल के आश्रय मे लिखी)
-(12) काव्यरसायन या शब्दरसायन
-(13) सुखसागर तरंग ( यह इनका अंग भेद संबंधी काव्य है इसमें काव्य के विभिन्न अंगो का वर्णन कवित व सवैया छंदों में किया गया है यह अनेक ग्रंथों से लिए गए कविताओं का संग्रह है|)
-(14) वृक्षविलास
-(15) पावसविलास
-(16) ब्रह्मदर्शन पचीसी
-(17) तत्वदर्शन पचीसी
-(18) आत्मदर्शन पचीसी
-(19) जगदर्शन पचीसी
-(20) रसानंद लहरी
-(21) प्रेमदीपिका
-(22) नखशिख
-(23) प्रेमदर्शन
Examvivechna
---विशेष तथ्य:-
- हिंदी साहित्य जगत् में देव कवि अपनी अक्खड़ स्वभाव के लिए प्रसिद्ध है जिसके कारण उनको अनेक लोगों (राजाओं) के आश्रय में रहना पड़ा था|
- हिंदी साहित्य जगत् में देव कवि एकमात्र ऐसे कवि हुए हैं जिन्होंने अपनी मौलिक उद्भावनाएं प्रकट की है|
- इनके अलंकार लक्षणों पर मुख्यता संस्कृत के आचार्य भामह (काव्यालंकार) एवं दंडी (काव्य दर्श) का प्रभाव पाया जाता है|
- रस शास्त्र की विवेचना करते हुए उन्होंने 'छल' नामक एक नया संचारी भाव प्रस्तुत किया है|
-'भूलि कहत नवरस सुकवि सकल मूल श्रृंगार' यह कथन कहकर आचार्य भोजराज की तरह इन्होंने केवल श्रृंगार रस को ही मूल रस माना है|
- भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनुसार ये 'हितहरिवंश' के अनन्य अनुयायी माने गए हैं।
---प्रसिद्ध पंक्तिया:-
-"अभिधा उत्तम काव्य है; मध्य लक्षणा लीन।
अधम व्यंजना रस विरस, उलटी कहत नवीन"
- "सुनो कै परम पद, ऊनो कै अनंत मद
नूनो कै नदीस नद, इंदिरा झुरै परी।"
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