'आँसू' कविता का सारांश
'आँसू' कविता का सारांश
जयशंकर प्रसाद -1889 ई०
--आँसू काव्य संग्रह का प्रकाशन 1925 ई० है।
-- 'आंसू' जयशंकर प्रसाद जी का प्रसिद्ध विरह काव्य है।
--कवि की भावुकता इस काव्य में मुख्य रूप से दृष्टिगत होती है। आँसू में प्रेम की स्मृति सत्यता के साथ अभिव्यक्त हुई है। जीवन में प्रत्येक अभिलाषा को पूरी करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है और उसमें असफल होने पर व्यक्ति चिन्ता, दुःख, असन्तोष और कुण्ठा से पीड़ित होता है आँसू इस प्रकार की प्रेमभावनाओं की चरम परिणति है।
--आँसू का सम्पूर्ण महत्त्व कवि के करुणाकलित हृदय से मुखरित विफल रागिनी में देखा जा सकता है। इस काव्य में कवि ने लौकिक प्रेम की व्यक्तिगत विरहानुभूति को अभिव्यक्त किया है।
--आँसू का मुख्य केन्द्र विरह शृंगार है। कवि के हृदय में एक शीतल ज्वाला जल रही है, जिसको आँसुओं के जल का ईंधन मिल रहा है
* शीतल ज्वाला जलती है, ईंधन होता दृग जल का, यह व्यर्थ साँस चल चल कर करती है काम द्वनिल का।
--आँसू पूर्ण रूप से विरह काव्य है। इसमें सम्भवतः कवि अपनी निष्ठ प्रेमिका को याद कर रहा है तथा उस समय के प्रेयसी के साथ बिताए प्रेम प्रसंगों को याद कर रहा है
*मादक थी मोहमयी थी, मन बहलाने की क्रीड़ा, अब हृदय हिला देती है, वह मधुर प्रेम की पीड़ा।
--कवि अपने एकांतिक जीवन के सुख और दुःख के अनुभव का चित्रण करते हुए कहता है कि जीवन सुख और दुःख की लीला भूमि है। यहाँ विरह और मिलन का परिचय हुआ करता है और शोक तथा आनन्द यहाँ नाचते रहते हैं।
* "मानव जीवन वेदी पर, परिणय हो विरह मिलन का सुख दुःख दोनों नाचेंगे, है खेल आँख और मन का।"
--'आँसू' एक श्रेष्ठ गीति काव्य है। गीति काव्य बाह्य जगत् को अपनी भावनानुसार देखता और ग्रहण करता है। गीति काव्य मे बौद्धिक जीवन की क्षमता और दार्शनिकता भी हो तो काव्य का सौन्दर्य और बढ़ जाता है।
--प्रसाद जी के 'आँसू' में ये दोनों तत्त्व उपस्थित हैं। सच्ची भावना ने इस काव्य को एक तीव्र आवेग प्रदान किया है। काव्य के प्रारम्भिक भाग में कवि का हृदय पक्ष प्रबल है।
--काव्य का अन्तिम चरण बौद्धिकता का दर्शन कराता है।
--अतः बौद्धिक चिन्तन और भाव प्रबलता से 'ऑसू' काव्य एक महत्त्वपूर्ण रचना बन पड़ी है। काव्य का प्रतीक विधान भी अपूर्व है।
--कथन की अभिव्यक्ति कवि द्वारा अमूर्त रूप में हुई है। सूक्ष्मता, अमूर्त तुलनाओं व उपमानों के द्वारा वह स्थूल का भी चित्रण करने में सफल रहे हैं। कवि ने सौन्दर्य में अप्रस्तुत विधान का प्रयोग किया है। प्राचीन समय से ही हिन्दी में सौन्दर्य चित्रण का परम्परागत अवधान रहा है, परन्तु प्रसाद ने इस परम्परा को सूक्ष्मता से उतार कर उसे कोमल रूप दिया है।
--'आँसू' काव्य की रचना 'आनन्द' छन्द में हुई है। काव्य में उपमा, रूपक, अनुप्रास, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण आदि अलंकारों का शोभनीय संयोजन हुआ है।
* गुलाबराय जी के अनुसार, "आँसू में संयोग की सुधि के बाद वियोग है और इस व्यक्ति दुःख को विश्व वेदना में समाहित करने की बात भी है।
आँसू काव्य की प्रमुख पंक्तियाँ:-
(1) बाँधा था विधु को किसने इन काली जंजीरों से। मणि वाले फणियों का मुख क्यों भरा हुआ है हीरों से ॥
(2) विद्रुम-सीपी-संपुट में मोती के दाने कैसे ? है हंस न, पर शुक फिर क्यों चुगने के मुक्ता ऐसा ।(3) झंझा झकोर गर्जन है, बिजली है नीरद माला। पाकर इस शून्य हृदय को, सबने आ डेरा डाला।
(4) पतझड़ था, झाड़ खड़े थे सूखे से फुलवारी में। किसलयदल कुसुम बिछाकर आए तुम इस क्यारी में ॥
(5) इस करुणा कलित हृदय में अब विकल रागिनी बजती ।
क्यों हाहाकार स्वरों में वेदना असीम गरजती ?
(6) मानव जीवन वेदी पर परिणय हो विरह मिलन का । दु:ख सुख दोनों नाचेंगे है खेल आँख का मन का ॥
(7) जल उठा स्नेह दीपक-सा, नवनीत हृदय था मेरा । अब शेष धूम रेखा से, चित्रित कर रहा अँधेरा ॥
(8) तेरे प्रकाश में चेतन संसार वेदना वाला। मेरे समीप होता है पाकर कुछ करुण उजाला ॥
(9) सबका निचोड़ लेकर तुम सुख से सूखे जीवन में। बरसो प्रभात हिमकन-सा आँसू इस विश्व सदन में ॥

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